हंसता-खेलता परिवार सिस्टम की भेंट चढ़ गया
मुजफ्फरपुर की ये दास्तां रूह क*पा देने वाली है जहाँ एक हंसता-खेलता परिवार सिस्टम की भेंट चढ़ गया। साल 2017 में रश्मि कुमारी और उनके पति राजू कुमार सौ फीसदी झुलसी हालत में अस्पताल पहुंचे और द*म तो*ड़ दिया लेकिन असली संघर्ष उनकी चि*ता ठंडी होने के बाद शुरू हुआ। इंसाफ की उम्मीद में खड़ी रश्मि की बहन नेहा और भाई प्रवीण-प्रफुल्ल के लिए न्याय की डगर कांटों भरी साबित हुई क्योंकि परिजनों का सीधा आरोप है कि पुलिस का रवैया इस मामले में पूरी तरह संदेहास्पद रहा। रश्मि की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट सालों तक फाइलों से गायब रही और राजू कुमार की मौ*त को लेकर तो पुलिस रिकॉर्ड्स में ऐसा मजाक हुआ कि जिस शख्स का पोस्टमॉर्टम 28 मई 2017 को हो चुका था उसकी मौत की तारीख कभी घटना के अगले दिन तो कभी छह महीने बाद तक दिखाई गई। ह*द तो तब हो गई जब 100% जले हुए व्यक्ति का एक कथित बयान घटना के 6 महीने बाद सामने आया जिस पर डॉक्टर के हस्ताक्षर होने का दावा किया गया और इसी फर्जीवाड़े ने पूरी जांच प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर दिया।
इस एक हाद*से ने रश्मि के तीनों भाई-बहनों प्रवीण, नेहा और प्रफुल्ल की जिंदगी का रुख ही पलट दिया। कभी यूपीएससी की तैयारी कर प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना देखने वाले इन युवाओं ने जब सिस्टम की संवेदनहीनता को झेला तो उन्होंने अपनी मंजिल बदल ली और कानून की पढ़ाई शुरू कर दी। आज ये तीनों वकालत के जरिए न केवल अपनी बहन को इंसाफ दिलाने की कसम खा चुके हैं बल्कि उन तमाम बेबस पीड़ितों के लिए ढाल बनना चाहते हैं जो व्यवस्था के आगे हार मान लेते हैं। हालांकि मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन डीएसपी शंकर कुमार झा को डिमोट कर इंस्पेक्टर बना दिया गया और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दखल के बाद सीआईडी जांच भी शुरू हुई लेकिन अहम दस्तावेजों की सच्चाई पर आज भी कानूनी जंग जारी है और ये भाई-बहन हा*र मानने को तैयार नहीं हैं।
